पाकिस्तान की सियासत में इन दिनों कुछ भी सामान्य नहीं चल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की बहन अलीमा खान की हिरासत ने देश के राजनीतिक पारे को अचानक बहुत ऊपर पहुंचा दिया है। लाहौर में हुई इस कार्रवाई के बाद मामला सिर्फ स्थानीय अदालतों या सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे जिनेवा और संयुक्त राष्ट्र की दहलीज पर जा पहुंचा है। जब सत्ता और विपक्ष आमने-सामने होते हैं, तो अक्सर परिवारों को भी इस संघर्ष की आंच झेलनी पड़ती है। पाकिस्तान में इस वक्त यही सब हो रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचा मनमानी हिरासत का मुद्दा
लाहौर में हुई हिरासत के तुरंत बाद मानवाधिकार मामलों के अंतरराष्ट्रीय जानकारों ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। राइट्स लॉयर माइकल पोलाक ने संयुक्त राष्ट्र के संबंधित स्पेशल प्रोसीजर के सामने अर्जेंट शिकायत दर्ज करा दी है। इस शिकायत को यूएन वर्किंग ग्रुप ऑन अर्बिटरी डेटिनेशन के पास भेजा गया है, साथ ही अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता से जुड़े स्पेशल रैपोर्टेयर्स को भी इसकी कॉपियां मिली हैं। पोलाक का साफ कहना है कि अलीमा खान को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह अपने भाई इमरान खान के राजनीतिक समर्थन और वैचारिक रुख के साथ मजबूती से खड़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के मामले उठने से पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े होने लाजिमी हैं।
कानून और आदेश का हवाला या सियासी दबाव
प्रशासन ने इस कार्रवाई के पीछे 'पंजाब मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर ऑर्डिनेंस 1960' का हवाला दिया है और 30 दिनों की निवारक हिरासत का आदेश दिया है। इसके बाद उन्हें कोट लखपत जेल भेज दिया गया। सरकार और स्थानीय प्रशासन का तर्क है कि यह कदम सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया है। लेकिन पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी पीटीआई का नजरिया बिल्कुल अलग है। पार्टी का आरोप है कि आगामी 27 सितंबर को होने वाले राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन और इस्लामाबाद मार्च को कमजोर करने के लिए यह सब किया जा रहा है। जब भी कोई राजनीतिक दल बड़े आंदोलन की तैयारी करता है, इस तरह की प्रशासनिक रोकटोक पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास का पुराना हिस्सा रही है।
परिवार के दूसरे सदस्यों पर भी गाज गिरने के दावे
यह विवाद सिर्फ अलीमा खान तक सीमित नहीं है। पीटीआई और परिवार के करीबियों का दावा है कि इमरान खान की अन्य बहनों, डॉ. उजमा खान और नोरीन नियाज़ी को भी इसी तरह के आदेशों के तहत हिरासत में लिया गया है। इसके अलावा, इमरान खान के बेटे कासिम खान ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया है कि उनके कई रिश्तेदारों और करीबियों को भी घरों से उठाया गया है। गिरफ्तारी के पुख्ता और स्पष्ट कारण न बताए जाने से परिवार में चिंता का माहौल है। विपक्ष इसे तानाशाही रवैया बता रहा है, जबकि सरकार अपनी कार्रवाई को सुरक्षा के दायरे में सही ठहराने की कोशिश कर रही है।
आगे क्या होने वाला है
आने वाले दिन पाकिस्तान की राजनीति के लिए बेहद संवेदनशील होने वाले हैं। एक तरफ 27 सितंबर को होने वाले बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारियां जोरों पर हैं, तो दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उल्लंघनों की शिकायतों ने कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। जब घरेलू राजनीति अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खिंच जाती है, तो सरकार के लिए स्थिति को संभालना और अधिक जटिल हो जाता है। देखना यह होगा कि अदालती लड़ाइयां और अंतरराष्ट्रीय दवाब इस सियासी ड्रम को किस दिशा में ले जाते हैं।