पाकिस्तान का मसूद अजहर पर इनाम नाटक क्यों किसी को मूर्ख नहीं बना रहा

पाकिस्तान का मसूद अजहर पर इनाम नाटक क्यों किसी को मूर्ख नहीं बना रहा

जब भी अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, इस्लामाबाद की प्रशासनिक मशीनरी एक पुराना नुस्खा निकालती है। इस बार जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर पर इनाम की रकम बढ़ाकर सत्तर लाख पाकिस्तानी रुपये कर दी गई है। लेकिन इस दिखावे से किसी को धोखा नहीं होना चाहिए। भारत ने साफ कर दिया है कि ये पाखंड भरे कदम खोखले हैं और आतंकवाद के खिलाफ इनसे जमीन पर कोई बदलाव नहीं आने वाला।

पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी एफआईए ने अपनी रेड बुक में इस खूंखार आतंकवादी का नाम अपडेट किया है। अधिकारियों का दावा है कि अजहर करीब अठारह साल से फरार है। सुनने में यह अजीब लगता है कि एक ग्लोबल आतंकवादी खुलेआम उसी देश में रहता है जिसकी खुफिया एजेंसियां उसे ढूंढने का नाटक करती हैं। भारतीय खुफिया सूत्रों का तकनीकी विश्लेषण कुछ और ही कहानी बयां करता है। पिछले कुछ महीनों के संकेत साफ बताते हैं कि मसूद अजहर पाकिस्तान के सिंध प्रांत के नवाबशाह शहर में पूरी सुरक्षा के बीच छिपा हुआ है। उसे पाकिस्तानी हुक्मरानों और सेना का संरक्षण हासिल है। ऐसे में सत्तर लाख रुपये का यह इनाम सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आंख में धूल झोंकने की एक सोची-समझी चाल भर है।

इस चाल के पीछे का समय बहुत कुछ कहता है। अक्टूबर में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की अहम बैठक होने वाली है। दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आतंकवाद की फंडिंग रोकने में कौन सा देश कितना गंभीर है। एफआईए ने साल 2021 में भी पचास लाख रुपये का इनाम रखा था। अब पांच साल बाद इसमें बीस लाख की मामूली बढ़ोतरी कर दी गई है। वैश्विक दबाव से बचने के लिए कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं ताकि एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट या अन्य पाबंदियों से बचा जा सके। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बिल्कुल सही कहा है कि ऐसी ड्रामेबाजी नई नहीं है। जब तक पाकिस्तान अपनी सरज़मीं पर चल रहे आतंकी ढांचे को नेस्तनाबूद नहीं करता, तब तक ऐसे कागजी फरमानों का कोई मतलब नहीं है।

कूटनीतिक मोर्चे पर ऐसे हथकंडों की पोल बार-बार खुली है। आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाने वाले देश जब इस तरह के इनाम घोषित करते हैं, तो दुनिया के समझदार देश अच्छी तरह जानते हैं कि इसके पीछे असल नीयत क्या है। आप एक तरफ आतंकियों को स्टेट गेस्ट जैसी सुरक्षा दें और दूसरी तरफ उन पर नाममात्र का इनाम रखकर दुनिया को यह बताएं कि आप उनकी तलाश कर रहे हैं, यह विरोधाभास अब किसी से छिपा नहीं है।

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पाकिस्तान को यह समझना होगा कि दुनिया अब इन चालबाजियों से बहकने वाली नहीं है। जब तक ठोस और दृश्यमान कार्रवाई जमीन पर नहीं दिखती, तब तक हर घोषणा एक छलावा मात्र रहेगी। असली कार्रवाई तब मानी जाएगी जब आतंकवादियों के ठिकानों पर बुलडोजर चलेगा, उनके वित्तीय नेटवर्क पूरी तरह सील होंगे और उन्हें सजा मिलेगी। कागजों पर इनाम बढ़ाने से आतंकवाद खत्म नहीं होता, उसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है जो इस्लामाबाद के पास कभी नहीं रही।

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SP

Sebastian Phillips

Sebastian Phillips is a seasoned journalist with over a decade of experience covering breaking news and in-depth features. Known for sharp analysis and compelling storytelling.