बेंजामिन नेतन्याहू और मुस्लिम देशों की दुश्मनी की वो कहानी जो अक्सर छिपाई जाती है

बेंजामिन नेतन्याहू और मुस्लिम देशों की दुश्मनी की वो कहानी जो अक्सर छिपाई जाती है

पश्चिम एशिया में बारूद की गंध और धमाकों की आवाजें अब आम हो चुकी हैं। लेबनान पर इजरायल के हमले लगातार तेज हो रहे हैं. बेरुत से लेकर दक्षिणी लेबनान के गांवों तक सिर्फ धुआं और मलबे का ढेर दिखाई दे रहा है. लोग अपने घरों को छोड़कर भागने पर मजबूर हैं. इस पूरी तबाही के केंद्र में एक ही नाम सबसे ज्यादा गूंज रहा है और वो है इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू। नेतन्याहू की आक्रामक नीतियों ने न सिर्फ लेबनान को आग में झोंक दिया है, बल्कि दुनिया के कई बड़े मुस्लिम देश उनके खून के प्यासे हो चुके हैं। आखिर ऐसा क्या है कि कुछ देश नेतन्याहू के नाम से ही चिढ़ते हैं? क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक विरोध है या इसके पीछे सदियों पुरानी दुश्मनी और जमीन की जंग है? इस बात को सीधे और साफ शब्दों में समझना जरूरी है।

जब हम बात करते हैं इजरायल और लेबनान के मौजूदा संकट की, तो यह सिर्फ आज की कहानी नहीं है. इसके तार बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। बेंजामिन नेतन्याहू को दुनिया एक ऐसे नेता के रूप में देखती है जो अपनी सत्ता बचाने और इजरायल के दबदबे को कायम रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसी वजह से पांच प्रमुख मुस्लिम देश ऐसे हैं जिनके साथ नेतन्याहू के रिश्ते पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं। ये देश इजरायल को नक्शे से मिटाने की बात करते हैं या फिर नेतन्याहू को अंतरराष्ट्रीय अदालत में खड़ा देखना चाहते हैं। For a deeper dive into similar topics, we recommend: this related article.

लेबनान पर इजरायल का गुस्सा और हिजबुल्लाह का मोर्चा

लेबनान इस समय सबसे भीषण दौर से गुजर रहा है. इजरायली सेना लगातार दक्षिणी लेबनान और बेरुत के इलाकों में हवाई हमले कर रही है. नेतन्याहू का साफ कहना है कि जब तक हिजबुल्लाह को पूरी तरह खत्म नहीं कर दिया जाता, तब तक उनके हमले नहीं रुकेंगे. लेकिन इस जंग की आड़ में आम लेबनानी नागरिक पीसे जा रहे हैं। अस्पताल तबाह हो चुके हैं और बुनियादी सुविधाएं खत्म हो गई हैं.

हिजबुल्लाह लेबनान का एक सशक्त शिया सैन्य और राजनीतिक संगठन है। इसे ईरान का खुला समर्थन हासिल है. नेतन्याहू के लिए हिजबुल्लाह को कुचलना एक कसम जैसा बन गया है. लेकिन लेबनान की सरकार और वहां के आम लोग इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानते हैं. लेबनान और इजरायल के बीच दशकों से सीमा विवाद रहा है, लेकिन नेतन्याहू के कार्यकाल में इसने जो हिंसक रूप लिया है, उसकी मिसाल पहले नहीं मिलती. यही वजह है कि लेबनान नेतन्याहू प्रशासन से सबसे ज्यादा नफरत करता है। To get more background on this issue, in-depth analysis can be read at Reuters.

ईरान के साथ नेतन्याहू की सीधी और पुरानी दुश्मनी

अगर इजरायल का कोई सबसे बड़ा और कट्टर दुश्मन है, तो वो ईरान है। ईरान और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच की दुश्मनी छिपी नहीं है। नेतन्याहू सालों से दुनिया के सामने चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि ईरान परमाणु बम बना रहा है और उसे रोकना जरूरी है. दूसरी तरफ, ईरान का मानना है कि इजरायल इस पूरे क्षेत्र में अमेरिका का एक मोहरा है जो मुस्लिम देशों को दबाने के लिए बनाया गया है.

ईरान सिर्फ बयानबाजी नहीं करता। उसने इजरायल के खिलाफ एक पूरा नेटवर्क तैयार किया है जिसे 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' कहा जाता है। इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, गाजा का हमास और यमन के हूती विद्रोही शामिल हैं। नेतन्याहू ने ईरान के अंदर घुसकर उसके बड़े सैन्य कमांडरों और वैज्ञानिकों की हत्याएं करवाई हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल पर सीधे मिसाइल हमले किए हैं। नेतन्याहू की नीतियां ईरान को पूरी तरह से अलग-थलग करने की रही हैं, यही कारण है कि तेहरान में नेतन्याहू को सबसे बड़ा खलनायक माना जाता है।

तुर्की और राष्ट्रपति एर्दोगन का आक्रामक रुख

तुर्की कभी इजरायल का एक बड़ा रणनीतिक साझेदार हुआ करता था। दोनों देशों के बीच व्यापारिक और सैन्य संबंध भी थे। लेकिन जब से बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायल की कमान संभाली और खासकर गाजा तथा लेबनान में सैन्य ऑपरेशन शुरू किए, तुर्की के तेवर बदल गए. तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने नेतन्याहू की तुलना एडॉल्फ हिटलर तक से कर दी है।

तुर्की ने इजरायल के साथ अपने सारे व्यापारिक रिश्ते तोड़ दिए हैं। एर्दोगन खुलकर हमास का समर्थन करते हैं और उसे एक स्वतंत्रता सेनानी संगठन बताते हैं। नेतन्याहू के प्रति तुर्की की चिढ़ इस बात से भी है कि नेतन्याहू यरूशलेम और अल-अक्सा मस्जिद के स्टेटस को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे मुस्लिम जगत में बेहद पवित्र माना जाता है। एर्दोगन खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता साबित करना चाहते हैं और इसके लिए नेतन्याहू पर हमला करना उनके लिए सबसे मुफीद जरिया है।

पाकिस्तान का रुख और मान्यता न देने की जिद

पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसका इजरायल के साथ कभी कोई राजनयिक संबंध नहीं रहा। पाकिस्तानी पासपोर्ट पर साफ लिखा होता है कि यह इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों के लिए वैध है। पाकिस्तान के लोगों और वहां की सरकार में इजरायल को लेकर एक पैदाइशी विरोध है। लेकिन बेंजामिन नेतन्याहू के दौर में यह विरोध और तीखा हो गया है।

पाकिस्तान का मानना है कि नेतन्याहू फिलिस्तीनियों पर अत्याचार कर रहे हैं और अब लेबनान में भी वही कहानी दोहरा रहे हैं. पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा इजरायल के खिलाफ वोट करता है। नेतन्याहू की दक्षिणपंथी और कट्टर यहूदी राष्ट्रवादी नीतियां पाकिस्तान के कट्टरपंथी नैरेटिव से सीधे टकराती हैं। पाकिस्तान के नेता अक्सर अपने देश की जनता को एकजुट करने के लिए नेतन्याहू के बयानों और इजरायली हमलों का इस्तेमाल करते हैं।

सीरिया पर लगातार हमले और नेतन्याहू की रणनीति

सीरिया भी इस सूची में एक बेहद अहम देश है। इजरायल और सीरिया के बीच गोलान हाइट्स को लेकर पुराना विवाद है, जिस पर इजरायल ने कब्जा कर रखा है. बेंजामिन नेतन्याहू के आदेश पर इजरायली वायुसेना आए दिन सीरिया की राजधानी दमिश्क और अन्य सैन्य ठिकानों पर बमबारी करती रहती है. इजरायल का तर्क होता है कि वो सीरिया में मौजूद ईरानी हथियारों के डिपो और हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बना रहा है।

लेकिन सीरिया के लिए यह उसकी संप्रभुता का खुला उल्लंघन है। सीरियाई सरकार नेतन्याहू को एक ऐसा तानाशाह मानती है जो अपने राजनीतिक फायदों के लिए पूरे मिडिल ईस्ट को तबाह करने पर तुला है। सालों से गृहयुद्ध झेल रहे सीरिया के लिए इजरायल के ये हमले जख्म पर नमक छिड़कने जैसे हैं। नेतन्याहू ने कभी भी सीरिया के साथ शांति की कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने हमेशा ताकत के बल पर उसे दबाने की नीति अपनाई है।

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नेतन्याहू की जिद और बदलता वैश्विक समीकरण

कई विश्लेषकों का मानना है कि बेंजामिन नेतन्याहू का यह आक्रामक रूप उनके घरेलू राजनीतिक संकट का नतीजा है। उन पर भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं। इजरायल के अंदर ही लोग उनके खिलाफ सड़कों पर उतरते रहे हैं। ऐसे में खुद को देश का रक्षक दिखाना और युद्ध को लंबा खींचना उनकी मजबूरी बन गया है।

मुस्लिम देशों की यह चिढ़ सिर्फ मजहबी नहीं है, बल्कि इसके पीछे गंभीर रणनीतिक और मानवीय कारण हैं। जब गाजा और लेबनान में हजारों निर्दोष बच्चे और महिलाएं मारी जाती हैं, तो मुस्लिम देशों में जनभावनाएं उबलने लगती हैं. कोई भी सरकार चाहकर भी नेतन्याहू के प्रति नरम रुख नहीं अपना सकती। अमेरिका का अंधा समर्थन नेतन्याहू को और बढ़ावा देता है, जिससे इन पांचों देशों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.

अगर आप इस पूरे घटनाक्रम को करीब से देखें, तो साफ समझ आता है कि जब तक नेतन्याहू सत्ता में हैं, तब तक मध्य पूर्व में शांति की उम्मीद करना बेमानी है. वे बातचीत के रास्ते बंद कर चुके हैं और सिर्फ सैन्य ताकत पर भरोसा करते हैं. यही वजह है कि ये 5 मुस्लिम देश उनसे इस कदर नफरत करते हैं।

अब समय आ गया है कि इस पूरे मामले पर नजर रखी जाए कि आने वाले दिनों में यह तनाव क्या रूप लेता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर होने वाले फैसलों और संयुक्त राष्ट्र के बयानों को बारीकी से समझें ताकि आप इस जंग के असली पीछे के कारणों को जान सकें। भू-राजनीति की इस शतरंज पर हर चाल मायने रखती है।

SP

Sebastian Phillips

Sebastian Phillips is a seasoned journalist with over a decade of experience covering breaking news and in-depth features. Known for sharp analysis and compelling storytelling.