क्यों होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित करने के लिए आगे आए ब्रिटेन और फ्रांस

क्यों होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित करने के लिए आगे आए ब्रिटेन और फ्रांस

अमेरिका और ईरान के बीच महीनों चले तनाव के बाद अब मिडिल ईस्ट में एक नया मोड़ आ गया है। हाल ही में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम समझौता हुआ। इसके तुरंत बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ते यानी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अपने आधुनिक माइंस साफ करने वाले युद्धपोत और नौसैनिक संपत्तियां तैनात कर दी हैं।

यह सिर्फ एक सामान्य सैन्य अभ्यास नहीं है। यह दुनिया की लाइफलाइन कहे जाने वाले इस समुद्री रास्ते से उन बारूदी सुरंगों को हटाने का एक बड़ा अभियान है जो पिछले कुछ महीनों में वहां बिछाई गई थीं। वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए इस रास्ते का सुरक्षित होना हर देश के लिए बेहद जरूरी है।

अमेरिका के पास क्षमता नहीं है या यह कोई बड़ी राजनीतिक चाल है

जब भी मिडिल ईस्ट में सुरक्षा की बात आती है तो लोग सबसे पहले अमेरिकी नौसेना की तरफ देखते हैं। लेकिन इस बार कहानी पूरी तरह से बदल गई है। नाटो के चीफ मार्क रुटे ने खुद यह बात स्वीकार की है कि अमेरिका के पास इस समय इतनी बड़ी मात्रा में समुद्री बारूदी सुरंगों (Naval Mines) को हटाने की विशेषज्ञता और जरूरी उपकरण नहीं हैं। यूरोप के पास यह क्षमता बहुत बेहतर स्थिति में है। इसी वजह से ब्रिटेन और फ्रांस ने इस 40 से अधिक देशों के गठबंधन का नेतृत्व अपने हाथों में लिया है।

ईमानदारी से कहें तो यह अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका भी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हालांकि इस समझौते का स्वागत किया है और कहा है कि वे इस रास्ते को कभी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक चोकपॉइंट नहीं बनने देंगे। लेकिन असल बात यही है कि जमीन पर काम करने के लिए उन्हें अपने यूरोपीय सहयोगियों की जरूरत पड़ रही है।

फ्रांस और ब्रिटेन की वास्तविक सैन्य तैनाती क्या है

इस बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए दोनों देशों ने अपनी बेहतरीन तकनीक को पानी में उतारा है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने स्पष्ट किया है कि उनके दो विशेष माइनहंटर जहाज, दो युद्धपोत (Frigates) और एक समुद्री गश्ती विमान इस इलाके में पूरी तरह से सक्रिय हैं। हालांकि उन्होंने अपने परमाणु संचालित विमान वाहक पोत 'चार्ल्स डी गॉल' को वापस अपने होम पोर्ट टूलॉन भेजने का फैसला किया है क्योंकि अब सीधे युद्ध की स्थिति नहीं है।

दूसरी तरफ ब्रिटिश रॉयल नेवी ने अपने विशेष जहाज 'आरएफए लाइम बे' (RFA Lyme Bay) को जिब्राल्टर से सीधे इस इलाके के लिए रवाना किया था। यह जहाज स्वायत्त माइन-हंटिंग सिस्टम (Autonomous Mine-Hunting Systems) से लैस है। यह पानी के नीचे बिना किसी इंसानी मदद के बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम है।

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इस पूरे मिशन में ओमान की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। ओमान ने ब्रिटेन और फ्रांस को अपने क्षेत्रीय जल क्षेत्र (Territorial Waters) में काम करने और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने की पूरी अनुमति दे दी है।

ईरान की तीखी प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय तनाव

तेहरान इस पूरी गतिविधि को बहुत अच्छी नजर से नहीं देख रहा है। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम गरीबाबादी ने सोशल मीडिया पर साफ शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल इसके तट पर बसे देशों की है। यह इलाका क्षेत्र से बाहर के देशों के लिए अपनी सैन्य शक्ति दिखाने का मंच नहीं है।

ईरान का दावा है कि उसके पास खुद इन बारूदी सुरंगों को साफ करने की पूरी क्षमता है और वह किसी भी विदेशी सैन्य दखल के खिलाफ है। लेकिन सच तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां ईरान पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। पिछले चार महीनों में जिस तरह से जहाजों पर हमले हुए और तेल की आपूर्ति रुकी, उसने वैश्विक बाजारों में डर पैदा कर दिया था।

वैश्विक तेल बाजार और व्यापार पर इसका सीधा असर

जैसे ही अमेरिका और ईरान के बीच इस समझौते की खबर आई और ब्रिटेन-फ्रांस ने माइंस हटाने का काम शुरू किया, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई। यह इस बात का सबूत है कि यह रास्ता पूरी दुनिया के लिए कितना मायने रखता है।

लेकिन केवल समझौता हो जाने से व्यापार पहले जैसा नहीं हो जाता। जहाजों को भेजने वाली कंपनियों को इस बात की 100% गारंटी चाहिए कि उनका करोड़ों का माल और क्रू मेंबर्स सुरक्षित रहेंगे। यही कारण है कि यह माइन-क्लियरिंग ऑपरेशन इतना महत्वपूर्ण है। जब तक समुद्र का कोना-कोना साफ नहीं हो जाता, तब तक कमर्शियल जहाज इस रास्ते से गुजरने से कतराते रहेंगे।

आगे क्या होने वाला है

यह पूरा मिशन अभी केवल 60 दिनों के लिए वैध है। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता एक अंतरिम व्यवस्था है। अगर अगले दो महीनों में किसी अंतिम और स्थायी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तो यह इलाका दोबारा युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो सकता है।

फिलहाल ब्रिटेन और फ्रांस के नेतृत्व में यह बहुराष्ट्रीय गठबंधन अगले कुछ हफ्तों तक पानी के नीचे बिछी हर एक माइन को खोजने और उसे निष्क्रिय करने के काम में जुटा रहेगा ताकि वैश्विक व्यापार को फिर से पटरी पर लाया जा सके।

SY

Sophia Young

With a passion for uncovering the truth, Sophia Young has spent years reporting on complex issues across business, technology, and global affairs.